Geographical Indication: बिहार के ‘खुरमा’, ‘तिलकुट’ और ‘बालू शाही’ को देश-दुनिया में मिलेगी पहचान, जीआई टैग के लिए निर्माता संघ की मदद करेगा नाबार्ड

0
14


ख़बर सुनें

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने बिहार के भोजपुर के उदवंतनगर के खुरमा, गया के तिलकुट और सीतामढ़ी जिले के स्वादिष्ट बालूशाही को देश-दुनिया में पहचान दिलाने के लिए आगे आया है। दरअसल नाबार्ड ने इन उत्पादों के लिए जीआई टैग की मांग करने वाले निर्माताओं/उत्पादक संघों की सुविधा के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह जानकारी नाबार्ड के एक अधिकारी ने दी।

नाबार्ड-बिहार के मुख्य महाप्रबंधक सुनील कुमार ने कहा, “हम खुरमा’, तिलकुट’ और ‘बालू शाही’ के लिए जीआई टैग की मांग करने वाले निर्माता/निर्माता संघों को सहायता प्रदान कर रहे हैं।” कुमार ने कहा कि इसके लिए निर्माता जल्द ही इन उत्पादों के लिए जीआई रजिस्ट्री (चेन्नई) में आवेदन करेंगे। उन्होंने कहा कि हम उत्पादक संघ के पंजीकरण की प्रक्रिया में हैं जो इन तीन उत्पादों के लिए जीआई पंजीकरण के लिए आवेदक होंगे।

उन्होंने बताया कि इससे पहले बिहार से हाल ही में जीआई रजिस्ट्री को तीन आवेदन दिए गए हैं,  जिनमें हाजीपुर के प्रसिद्ध चिनिया किस्म के केले, नालंदा की लोकप्रिय बावन बूटी साड़ी और गया के पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट के लिए जीआई टैग की मांग की गई है।

सुनील कुमार ने बताया कि हाजीपुर का चिनिया केला, नालंदा की बावन बूटी साड़ी और गया के पत्थर शिल्प के लिए जीआई टैग की मांग के लिए आवेदन पहले ही नाबार्ड के समर्थन से संबंधित क्षेत्रों के कुशल पत्थर कारीगरों से जुड़े किसानों, बुनकरों और संगठनों द्वारा भेजे जा चुके हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘नाबार्ड, बिहार ने जीआई के तहत पंजीकृत होने के लिए खुरमा, तिलकुट और बालू शाही सहित क्षेत्र के छह संभावित उत्पादों की पहचान की है। बिहार राज्य स्वाद के लिए जाना जाता है जहां कई स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ मिलते हैं।’’ उन्होंने कहा कि नाबार्ड जीआई पंजीकरण और जीआई टैग मिलने के बाद की प्रक्रिया जैसे उत्पादों की मार्केटिंग लिंकेज, ब्रांडिंग और प्रचार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

कुमार ने कहा कि भोजपुर का खुरमा भी विदेशियों को बहुत पसंद आता है, यह अंदर से मिठास के साथ-साथ इतना रसीला होता है कि स्वाद जीभ से मन तक को संतुष्ट कर देने वाला होता है। उन्होंने कहा कि यही हाल गया के प्रसिद्ध तिलकुट का भी है, तिल और गुड़ से बना अनोखा तिलकुट देश के बाहर भी काफी लोकप्रिय है। सीतामढ़ी के रून्नीसैदपुर इलाके की स्वादिष्ट मिठाई बालूशाही भी देश में बहुत लोकप्रिय है।

उन्होंने कहा कि बिहार के इन उत्पादों को जीआई टैग मिलना चाहिए। हाल ही में जीआई पंजीकरण ने बिहार मखाना का नाम बदलकर मिथिला मखाना करने की याचिका को स्वीकार कर लिया है। बिहार के कतरनी चावल, जर्दालु आम, शाही लीची, मगही पान और सिलाओ का खाजा को पहले ही जीआई टैग मिल चुका है।

वित्त मंत्रालय के तहत काम करने वाला नाबार्ड ग्रामीण क्षेत्रों में एकीकृत ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने और ग्रामीण क्षेत्रों की समृद्धि हासिल करने के उद्देश्य से कृषि, लघु उद्योगों, कुटीर और ग्रामोद्योग, हस्तशिल्प और अन्य ग्रामीण शिल्प और अन्य संबद्ध आर्थिक गतिविधियों के प्रचार और विकास के लिए ऋण और अन्य सुविधाएं प्रदान करने और विनियमित करने के लिए अधिकृत है। 

क्या होता है जीआई टैग
किसी भी क्षेत्र का जो क्षेत्रीय उत्पाद होता है उससे उस क्षेत्र की पहचान होती है। उस उत्पाद की ख्याति जब देश-दुनिया में फैलती है तो उसे प्रमाणित करने के लिए एक प्रक्रिया होती है जिसे जीआई टैग यानी जीओग्राफिकल इंडीकेटर (Geographical Indications) कहते हैं। जिसे हिंदी में भौगोलिक संकेतक के नाम से जाना जाता है।
 

1999 में बना अधिनियम
संसद ने उत्पाद के रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण को लेकर दिसंबर 1999 में अधिनियम पारित किया था। जिसे अंग्रेजी में Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 कहा गया। इसे 2003 में लागू किया गया था। इसके तहत भारत में पाए जाने वाले प्रॉडक्ट के लिए जी आई टैग देने का सिलसिला शुरू हुआ था।

जीआई टैग मिलने से क्या होता है फायदा?
जीआई टैग का सर्टिफिकेट मिलने के बाद उसका प्रयोग एक ही समुदाय कर सकता है। जैसे ओडिशा के रसगुल्ला के लिए जो लोगो मिला, उसका इस्तेमाल रसगुल्ले के डिब्बे पर सिर्फ ओडिशा के लोग कर सकते हैं। जीआई टैग 10 साल के लिए मिलता है। हालांकि इसे रिन्यू करा सकते हैं। जीआई टैग मिलने से उत्पाद का मूल्य और उससे जुड़े लोगों की अहमियत बढ़ जाती है। फेक प्रॉडक्ट को रोकने में मदद मिलती है और संबंधित लोगों को इससे आर्थिक फायदा भी होता है।

विस्तार

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने बिहार के भोजपुर के उदवंतनगर के खुरमा, गया के तिलकुट और सीतामढ़ी जिले के स्वादिष्ट बालूशाही को देश-दुनिया में पहचान दिलाने के लिए आगे आया है। दरअसल नाबार्ड ने इन उत्पादों के लिए जीआई टैग की मांग करने वाले निर्माताओं/उत्पादक संघों की सुविधा के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह जानकारी नाबार्ड के एक अधिकारी ने दी।

नाबार्ड-बिहार के मुख्य महाप्रबंधक सुनील कुमार ने कहा, “हम खुरमा’, तिलकुट’ और ‘बालू शाही’ के लिए जीआई टैग की मांग करने वाले निर्माता/निर्माता संघों को सहायता प्रदान कर रहे हैं।” कुमार ने कहा कि इसके लिए निर्माता जल्द ही इन उत्पादों के लिए जीआई रजिस्ट्री (चेन्नई) में आवेदन करेंगे। उन्होंने कहा कि हम उत्पादक संघ के पंजीकरण की प्रक्रिया में हैं जो इन तीन उत्पादों के लिए जीआई पंजीकरण के लिए आवेदक होंगे।

उन्होंने बताया कि इससे पहले बिहार से हाल ही में जीआई रजिस्ट्री को तीन आवेदन दिए गए हैं,  जिनमें हाजीपुर के प्रसिद्ध चिनिया किस्म के केले, नालंदा की लोकप्रिय बावन बूटी साड़ी और गया के पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट के लिए जीआई टैग की मांग की गई है।

सुनील कुमार ने बताया कि हाजीपुर का चिनिया केला, नालंदा की बावन बूटी साड़ी और गया के पत्थर शिल्प के लिए जीआई टैग की मांग के लिए आवेदन पहले ही नाबार्ड के समर्थन से संबंधित क्षेत्रों के कुशल पत्थर कारीगरों से जुड़े किसानों, बुनकरों और संगठनों द्वारा भेजे जा चुके हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘नाबार्ड, बिहार ने जीआई के तहत पंजीकृत होने के लिए खुरमा, तिलकुट और बालू शाही सहित क्षेत्र के छह संभावित उत्पादों की पहचान की है। बिहार राज्य स्वाद के लिए जाना जाता है जहां कई स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ मिलते हैं।’’ उन्होंने कहा कि नाबार्ड जीआई पंजीकरण और जीआई टैग मिलने के बाद की प्रक्रिया जैसे उत्पादों की मार्केटिंग लिंकेज, ब्रांडिंग और प्रचार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

कुमार ने कहा कि भोजपुर का खुरमा भी विदेशियों को बहुत पसंद आता है, यह अंदर से मिठास के साथ-साथ इतना रसीला होता है कि स्वाद जीभ से मन तक को संतुष्ट कर देने वाला होता है। उन्होंने कहा कि यही हाल गया के प्रसिद्ध तिलकुट का भी है, तिल और गुड़ से बना अनोखा तिलकुट देश के बाहर भी काफी लोकप्रिय है। सीतामढ़ी के रून्नीसैदपुर इलाके की स्वादिष्ट मिठाई बालूशाही भी देश में बहुत लोकप्रिय है।

उन्होंने कहा कि बिहार के इन उत्पादों को जीआई टैग मिलना चाहिए। हाल ही में जीआई पंजीकरण ने बिहार मखाना का नाम बदलकर मिथिला मखाना करने की याचिका को स्वीकार कर लिया है। बिहार के कतरनी चावल, जर्दालु आम, शाही लीची, मगही पान और सिलाओ का खाजा को पहले ही जीआई टैग मिल चुका है।

वित्त मंत्रालय के तहत काम करने वाला नाबार्ड ग्रामीण क्षेत्रों में एकीकृत ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने और ग्रामीण क्षेत्रों की समृद्धि हासिल करने के उद्देश्य से कृषि, लघु उद्योगों, कुटीर और ग्रामोद्योग, हस्तशिल्प और अन्य ग्रामीण शिल्प और अन्य संबद्ध आर्थिक गतिविधियों के प्रचार और विकास के लिए ऋण और अन्य सुविधाएं प्रदान करने और विनियमित करने के लिए अधिकृत है। 

क्या होता है जीआई टैग

किसी भी क्षेत्र का जो क्षेत्रीय उत्पाद होता है उससे उस क्षेत्र की पहचान होती है। उस उत्पाद की ख्याति जब देश-दुनिया में फैलती है तो उसे प्रमाणित करने के लिए एक प्रक्रिया होती है जिसे जीआई टैग यानी जीओग्राफिकल इंडीकेटर (Geographical Indications) कहते हैं। जिसे हिंदी में भौगोलिक संकेतक के नाम से जाना जाता है।

 

1999 में बना अधिनियम

संसद ने उत्पाद के रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण को लेकर दिसंबर 1999 में अधिनियम पारित किया था। जिसे अंग्रेजी में Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999 कहा गया। इसे 2003 में लागू किया गया था। इसके तहत भारत में पाए जाने वाले प्रॉडक्ट के लिए जी आई टैग देने का सिलसिला शुरू हुआ था।

जीआई टैग मिलने से क्या होता है फायदा?

जीआई टैग का सर्टिफिकेट मिलने के बाद उसका प्रयोग एक ही समुदाय कर सकता है। जैसे ओडिशा के रसगुल्ला के लिए जो लोगो मिला, उसका इस्तेमाल रसगुल्ले के डिब्बे पर सिर्फ ओडिशा के लोग कर सकते हैं। जीआई टैग 10 साल के लिए मिलता है। हालांकि इसे रिन्यू करा सकते हैं। जीआई टैग मिलने से उत्पाद का मूल्य और उससे जुड़े लोगों की अहमियत बढ़ जाती है। फेक प्रॉडक्ट को रोकने में मदद मिलती है और संबंधित लोगों को इससे आर्थिक फायदा भी होता है।

S

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here